{ Rashtrapati Aur Hamara Samvidhan } भारत के राष्ट्रपति और हमारा संविधान

Rashtrapati Aur Hamara Samvidhan

{Rashtrapati Aur Hamara Samvidhan} भारत के राष्ट्रपति और हमारा संविधान

President of India या भारत के राष्ट्रपति का पद हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है | राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक माना जाता है। भारत के राष्ट्रपति, भारत गणराज्य के कार्यपालक अध्यक्ष होते हैं। संघ के सभी कार्यपालक कार्य उनके नाम से किये जाते हैं। हमारे देश का संविधान भारत के राष्ट्रपति को बहुत सारी शक्तियां और अधिकार देता है।

इसी वजह से राष्ट्रपति से सम्बंधित अनुच्छेद पर प्रश्न प्रतियोगिता परीक्षाओं में खूब पूंछे जाते हैं। आप चाहें तो इसे PDF के रूप में नीचे दिए डाउनलोड लिंक से डाउनलोड भी कर सकते हैं।

 

 समय के अनुसार में भारत के राष्ट्रपतियों के नाम और कार्यकाल की सूची निम्नलिखित है:

संख्या
   नाम
 कार्यकाल
 1.  ऱाजेन्द्र प्रसाद  1950 से 1962
 2.  सर्वपल्ली राधाकृष्णन  1962 से 1967
 3.  जाकिर हुसैन  1967 से 1969
 वी.वी. गिरि (कार्यवाहक अध्यक्ष)  1969 से 1969
 मोहम्मद हिदायतुल्ला (कार्यवाहक अध्यक्ष)  1969 से 1969
 4.  वी.वी. गिरि  1969 से 1974
 5.  फखरुद्दीन अली अहमद  1974 से 1977
 बसप्पा दानप्पा जट्टी (कार्यवाहक अध्यक्ष)  1977 से 1977
 6.  नीलम संजीव रेड्डी  1977 से 1982
 7.  ज्ञानी जेल सिंह  1982 से 1987
 8.  आर.वेंकटरमन  1987 से 1992
 9.  शंकर दयाल शर्मा  1992 से 1997
 10.  के.आर. नारायणन  1997 से 2002
 11.  एपीजे अब्दुल कलाम  2002 से 2007
 12.  प्रतिभा पाटिल  2007 से 2012
 13.  प्रणव मुखर्जी  2012 से 2017
 14.  राम नाथ कोविंद 2017 से वर्तमान
  1. अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालक शक्ति उनमें निहित हैं।
  2. वह भारतीय सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनानायक भी हैं।
  3. सभी प्रकार के आपातकाल लगाने व हटाने वाला, युद्ध/शांति की घोषणा करने वाला होता है।
  4. वह देश के प्रथम नागरिक हैं।
  5. संविधान का 72वाँ अनुच्छेद राष्ट्रपति को न्यायिक शक्तियाँ देता है कि वह दंड का उन्मूलन, क्षमा, आहरण, परिहरण, परिवर्तन कर सकता है।
  6. राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के आधार पर केवल महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है (अनुच्छेद 61)
  7. अब तक केवल पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने ही इस पद पर दो बार अपना कार्यकाल पूरा किया है।
  8. प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभीत करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति थीं ।
  9. वर्तमान में राम नाथ कोविन्द भारत के चौदहवें राष्ट्रपति हैं।
  10. डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति बने |भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम कितनी भी बार पद पर रह सकते हैं इसकी कोई सीमा तय नहीं है।
  11. राष्ट्रपति पर अनुच्छेद 61  के आधार पर महाभियोग लगाया जा सकता है |
  12. भारत के राष्ट्रपति के पास अध्यादेश जारी करने का अधिकार अनुच्छेद 123 से मिल जाता है।
  13. अनुच्छेद 143 भारत के राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की शक्ति प्रदान करता है।
  14. संसद के दोनों सदनों में पारित विधेयक बिना राष्ट्रपति की सहमति के कानून नहीं बन सकता है।
  15. अनुच्छेद 111 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों में पारित बिल पर अपनी सहमति रोक सकता है।

राष्ट्रपति का इतिहास:

15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था और अन्तरिम व्यवस्था के तहत देश एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य बन गया। इस व्यवस्था के तहत भारत के गवर्नर जनरल को भारत के राष्ट्रप्रमुख के रूप में स्थापित किया गया, जिन्हें ब्रिटिश इंडिया में ब्रिटेन के अन्तरिम राजा – जॉर्ज VI द्वारा ब्रिटिश सरकार के बजाय भारत के प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त करना था।

यह एक अस्थायी उपाय था, परन्तु भारतीय राजनीतिक प्रणाली में साझा राजा के अस्तित्व को जारी रखना सही मायनों में संप्रभु राष्ट्र के लिए उपयुक्त विचार नहीं था।

आजादी से पहले भारत के आखरी ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन ही भारत के पहले गवर्नर जनरल बने थे। जल्द ही उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को यह पद सौंप दिया, जो भारत के इकलौते भारतीय मूल के गवर्नर जनरल बने थे।

इसी बीच डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को भारतीय संविधान का मसौदा तैयार हो चुका था और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से संविधान को स्वीकार किया गया था।

इस तारीख का प्रतीकात्मक महत्व था क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन से पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज़ दी थी। जब संविधान लागू हुआ और डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति का पद संभाला तो उसी समय गवर्नर जनरल और राजा का पद एक निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।

भारत के राष्ट्रपति पद के लिए योग्यता:

  1. भारतीय राष्ट्रपति का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है।
  2. आयु 35 साल से अधिक
  3. वह लोक सभा का सदस्य चुने जाने की योग्यता रखता हो |
  1. वह संघ या राज्य या स्थानीय सरकार के अधीन किसी लाभप्रद पद पर कार्यरत न हो | राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति ,राज्यपाल व मत्रियों के लिए चुनाव लड़ने से पूर्व त्यागपत्र देना आवश्यक नहीं, किन्तु वह संसद विधान मंडल का सदस्य नहीं हो सकता |
  2. उसे निर्वाचक मंडल के कम से कम 50 मतदाताओं द्वारा प्रस्तवित एवं 50 अन्य मतदाताओं द्वारा समर्थित होना चाहिए|

राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया:

  • राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के आधार पर केवल महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है (अनुच्छेद 61) |
  • ऐसा प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा में पेश हो सकता है | महाभियोग प्रस्ताव पेश करने का नोटिस इस सदन के एक -चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर द्वारा 14 दिन पहले देना जरूरी है |

राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते:

  • राष्ट्रपति का वेतन बढ़ाकर 1,50,000 रूपये प्रतिमाह कर दिया गया है |

राष्ट्रपति की पदावधि:

  • राष्ट्रपति पदग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक अपने पद पर बना रह सकता है | लेकिन इस 5 वर्ष की अवधि के पूर्व भी वह उपराष्ट्रपति की अपना त्याग पत्र दे सकता है या उसके द्वारा संविधान का अतिक्रमण करने पर महाभियोग प्रक्रिया के द्वारा हटाया जा सकता है |
  • सामान्य परिस्थियों में राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होने से पूर्व ही चुनाव संपन्न हो जाने चाहिए , किन्तु किसी कारण से ऐसा संभव न हो, तो वर्तमान राट्रपति तब तक पद पर रहेंगे |

राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया:

  • राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है , जिसके सदस्य होते है –
    • संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य, तथा
    • राज्यों की विधानसभों के निर्वाचित सदस्य(संसद के मनोनीत सदस्यों को राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेने का अधिकार नहीं है | )
  • 70वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में दिल्ली व पांडिचेरी विधानसभा के निर्वाचित सदस्य भाग लेंगे |
  • 11वें संविधान संशोधन,1961 द्वारा यह व्यवस्था कर दी गई है कि निर्वाचक मंडल में किसी स्थान के रिक्त होते हुए भी राष्ट्रपति का चुनाव कराया जा सकता है |
  • प्रत्येक राज्य की जनसँख्या को उस राज्य की विधानसभा की कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या से विभाजित किया जाता है और जो भागफल होता है ,उसे पुनः 1000 से विभाजित किया जाता है | ऐसा करने के बाद जो अंतिम भागफल आता है, वह प्रत्येक विधायक मत का मूल्य होता है |
  • पुरे भारत की समस्त विधानसभाओं के सदस्यों के कुल मतों की संख्या को संसद के दोनों सदनों के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या से विभाजित करने के बाद जो भागफल आता है, वही प्रत्येक संसद सदस्य के मत का मूल्य होता है |
  • राष्ट्रपति चुनाव में एक बार को छोड़कर सभी बार प्रथम गणना में ही निर्धारित संख्या उम्मीदवार ने प्राप्त कर ली है | 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में पहली और अंतिम बार दूसरे दौर की मतगणना करनी पड़ी थी , जब दूसरे के बाद ही वी. वी. गिरि ने निर्धारित कोटे को प्राप्त किया था |

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राष्ट्रपति की शक्तियाँ:

न्यायिक शक्तियाँ

संविधान का 72वाँ अनुच्छेद राष्ट्रपति को न्यायिक शक्तियाँ देता है कि वह दंड का उन्मूलन, क्षमा, आहरण, परिहरण, परिवर्तन कर सकता है।

  • क्षमादान– किसी व्यक्ति को मिली संपूर्ण सजा तथा दोष सिद्धि और उत्पन्न हुई निर्योज्ञताओं को समाप्त कर देना तथा उसे उस स्थिति में रख देना मानो उसने कोई अपराध किया ही नहीं था। यह लाभ पूर्णतः अथवा अंशतः मिलता है तथा सजा देने के बाद अथवा उससे पहले भी मिल सकती है।
  • लघुकरण– दंड की प्रकृति कठोर से हटा कर नम्र कर देना उदाहरणार्थ सश्रम कारावास को सामान्य कारावास में बदल देना
  • परिहार– दंड की अवधि घटा देना परंतु उस की प्रकृति नहीं बदली जायेगी
  • विराम– दंड में कमी ला देना यह विशेष आधार पर मिलती है जैसे गर्भवती महिला की सजा में कमी लाना
  • प्रविलंबन– दंड प्रदान करने में विलम्ब करना विशेषकर मृत्यु दंड के मामलों में

राष्ट्रपति की क्षमाकारी शक्तियां पूर्णतः उसकी इच्छा पर निर्भर करती हैं। उन्हें एक अधिकार के रूप में मांगा नहीं जा सकता है। ये शक्तियां कार्यपालिका प्रकृति की है तथा राष्ट्रपति इनका प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करेगा। न्यायालय में इनको चुनौती दी जा सकती है। इनका लक्ष्य दंड देने में हुई भूल का निराकरण करना है जो न्यायपालिका ने कर दी हो।

शेरसिंह बनाम पंजाब राज्य 1983 में सुप्रीमकोर्ट ने निर्णय दिया की अनु 72, अनु 161 के अंतर्गत दी गई दया याचिका जितनी शीघ्रता से हो सके उतनी जल्दी निपटा दी जाये। राष्ट्रपति न्यायिक कार्यवाही तथा न्यायिक निर्णय को नहीं बदलेगा वह केवल न्यायिक निर्णय से राहत देगा याचिकाकर्ता को यह भी अधिकार नहीं होगा कि वह सुनवाई के लिये राष्ट्रपति के समक्ष उपस्थित हो

वीटो शक्तियाँ

विधायिका की किसी कार्यवाही को विधि बनने से रोकने की शक्ति वीटो शक्ति कहलाती है संविधान राष्ट्रपति को तीन प्रकार के वीटो देता है।

  • (१) पूर्ण वीटो– निर्धारित प्रकिया से पास बिल जब राष्ट्रपति के पास आये (संविधान संशोधन बिल के अतिरिक्त) तो वह् अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति की घोषणा कर सकता है किंतु यदि अनु 368 (सविधान संशोधन) के अंतर्गत कोई बिल आये तो वह अपनी अस्वीकृति नहीं दे सकता है। यद्यपि भारत में अब तक राष्ट्रपति ने इस वीटो का प्रयोग बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के नहीं किया है माना जाता है कि वह ऐसा कर भी नहीं सकता (ब्रिटेन में यही पंरपंरा है जिसका अनुसरण भारत में किया गया है)।
  • (२) निलम्बनकारी वीटो– संविधान संशोधन अथवा धन बिल के अतिरिक्त राष्ट्रपति को भेजा गया कोई भी बिल वह संसद को पुर्नविचार हेतु वापिस भेज सकता है किंतु संसद यदि इस बिल को पुनः पास कर के भेज दे तो उसके पास सिवाय इसके कोई विकल्प नहीं है कि उस बिल को स्वीकृति दे दे। इस वीटो को वह अपने विवेकाधिकार से प्रयोग लेगा। इस वीटो का प्रयोग अभी तक संसद सदस्यों के वेतन बिल भत्ते तथा पेंशन नियम संशोधन 1991 में किया गया था। यह एक वित्तीय बिल था। राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमण ने इस वीटो का प्रयोग इस आधार पर किया कि यह बिल लोकसभा में बिना उनकी अनुमति के लाया गया था।
  • (३) पॉकेट वीटो– संविधान राष्ट्रपति को स्वीकृति अस्वीकृति देने के लिये कोई समय सीमा नहीं देता है यदि राष्ट्रपति किसी बिल पर कोई निर्णय ना दे (सामान्य बिल, न कि धन या संविधान संशोधन) तो माना जायेगा कि उस ने अपने पॉकेट वीटो का प्रयोग किया है यह भी उसकी विवेकाधिकार शक्ति के अन्दर आता है। पेप्सू बिल 1956 तथा भारतीय डाक बिल 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने इस वीटो का प्रयोग किया था।

राष्ट्रपति की संसदीय शक्ति:

राष्ट्रपति संसद का अंग है। कोई भी बिल बिना उसकी स्वीकृति के पास नहीं हो सकता अथवा सदन में ही नहीं लाया जा सकता है।

राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ

  1. अनु 74 के अनुसार
    2. अनु 78 के अनुसार प्रधान मंत्री राष्ट्रपति को समय समय पर मिल कर राज्य के मामलों तथा भावी विधेयकों के बारे में सूचना देगा, इस तरह अनु 78 के अनुसार राष्ट्रपति सूचना प्राप्ति का अधिकार रखता है यह अनु प्रधान मंत्री पर एक संवैधानिक उत्तरदायित्व रखता है यह अधिकार राष्ट्रपति कभी भी प्रयोग ला सकता है इसके माध्यम से वह मंत्री परिषद को विधेयकों निर्णयों के परिणामों की चेतावनी दे सकता है
    3. जब कोई राजनैतिक दल लोकसभा में बहुमत नहीं पा सके तब वह अपने विवेकानुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति करेगा
    4. निलंबन वीटो/पॉकेट वीटो भी विवेकी शक्ति है
    5. संसद के सदनो को बैठक हेतु बुलाना
    6. अनु 75 (3) मंत्री परिषद के सम्मिलित उत्तरदायित्व का प्रतिपादन करता है राष्ट्रपति मंत्री परिषद को किसी निर्णय पर जो कि एक मंत्री ने व्यक्तिगत रूप से लिया था पर सम्मिलित रूप से विचार करने को कह सकता है
    7. लोकसभा का विघटन यदि मंत्रीपरिषद को बहुमत प्राप्त नहीं है तो लोकसभा का विघटन उसकी विवेक शक्ति के दायरे में आ जाता है
    किसी कार्यवाहक सरकार के पास लोकसभा का बहुमत नहीं होता इस प्रकार की सरकार मात्र सामन्य निर्णय ही ले सकती है ना कि महत्वपूर्ण निर्णय। यह राष्ट्रपति निर्धारित करेगा कि निर्णय किस प्रकृति का है

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