Mission Shakti and chinook helicopter

Important mission Mission Shakti and chinook helicopter

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हेलो दोस्तों आज के  इस  पोस्ट में हाल ही में चर्चा में आये भारतीय सेना तथा इसरो सम्बंधित मिशन और तथ्य हम आपके लिए लाये हैं जैसे Mission Shakti, chinook helicopter और चंद्रयान – 2 ये सभी मिशन परीक्षाओं की दृष्टि से Gk in Hindi के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम इस पोस्ट में इन तीनो ही विषयों के बारे में  संक्षेप में  बताने जा रहे हैं।

दोस्तों mission shakti में ASAT यानी एंटी-सैटेलाइट तकनीक का इस्तेमाल करने वाले देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद अब भारत भी शामिल हो चूका है। भारतीय वायुसेना ने 25 मार्च 2019 को चंडीगढ़ वायुसेना स्टेशन पर औपचारिक रूप से Boeing CH-47 Chinook हेलीकॉप्टर को अपने बेड़े में शामिल कर लिया | चंद्रयान-2 नासा के लेजर उपकरणों को चंद्रमा तक लेकर जाएगा | आइए  अब इनके बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं।

मिशन शक्ति क्यों है खास ( Important Fact about Mission Shakti )

1. ASAT का उपयोग भारत के 1998 के परमाणु परीक्षणों की तरह ही नए सीमा पार करने के रूप में देखा जाता है। एंटी-सैटेलाइट तकनीक अब तक बहुत कम देशों के हाथों में रही है: संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन। इस प्रौद्योगिकी का अधिग्रहण और प्रदर्शन भारत को देशों के एक कुलीन समूह का सदस्य बनाता है।

2. यह तथ्य कि यह एंटी-सैटेलाइट तकनीक स्वदेशी रूप से विकसित है, भारत की साख में इजाफा करती है, यह देखते हुए कि कई दशकों तक भारत को प्रमुख प्रौद्योगिकियों को प्राप्त करने से दूर रखा गया था, जिससे देश अपनी खुद की अंतरिक्ष और परमाणु क्षमताओं को विकसित करने के लिए मजबूर हो गया।

3. उपग्रह रोधी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, पाकिस्तान से परे भारत की सुरक्षा चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती है। नई दिल्ली स्थित थिंक-टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विश्लेषक अरविंद के। जॉन के अनुसार, “एएसएटी हथियार अगले कुछ दशकों में सशस्त्र बलों के लिए सबसे शक्तिशाली सैन्य उपकरण होने की संभावना है, एक क्रांतिकारी तकनीकी सफलता के बावजूद।”

4. इस तकनीक के अधिग्रहण से ऐसी स्पिन-ऑफ होने की उम्मीद है, जिसका भारत घरेलू और वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक उपयोग के लिए दोहन कर सकता है।

वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण के लिए अपने स्वयं के वाहनों को विकसित करने के बाद, आज भारत अन्य देशों के उपग्रह लॉन्च कर रहा है। एक समय था जब यह एरियन जैसे फ्रांसीसी-निर्मित लॉन्च वाहनों पर पिग्गीबैक करता था

 

चिनूक हेलीकाप्टर  विशेषताएं ( Facts about chinook helicopter)

भारतीय वायुसेना ने 25 मार्च 2019 को चंडीगढ़ वायुसेना स्टेशन पर औपचारिक रूप से chinook helicopter को अपने बेड़े में शामिल कर लिया. इस मौके पर भारतीय वायुसेना के प्रमुख एयर चीफ मार्शल बीएस धनोआ भी मौजूद थे, जिन्‍होंने इसे ‘राष्‍ट्रीय धरोहर’ करार दिया.

चिनूक हेलीकॉप्टर की मदद से ना सिर्फ़ सेना को युद्ध से जुड़े हथियारों को ले जाने में मदद मिलेगी बल्कि इसके ज़रिए प्राकृतिक आपदा के दौरान चलने वाले सैन्य अभियानों में भी प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों में ले जाने और राहत सामग्री जुटाने में मदद मिलेगी.

इस हेलीकॉप्टर का दुनिया के कई भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में काफी क्षमता से संचालन होता रहा है. चिनूक हेलीकॉप्टर अमेरिकी सेना के अतिरिक्त कई देशों की सेनाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहा है.

भारतीय वायुसेना ने सितंबर 2015 में 15 चिनूक हेलीकॉप्टरों के लिए मेसर्स बोइंग लिमिटेड के साथ समझौता किया था. चार हेलीकॉप्टरों की पहली खेप समय पर उपलब्ध करा दी गयी थी. अंतिम खेप मार्च 2020 तक पहुंच जाएगी. इन हेलीकॉप्टरों को भारत के उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में तैनात किया जाएगा.

चिनूक का निर्माण बोइंग कंपनी करती है. हालांकि ये साल 1962 से प्रचलन में हैं. लेकिन बोइंग ने समय-समय पर इनमें सुधार किया है, इसलिए आज भी करीब 25 देशों की सेनाएं इनका इस्तेमाल करती हैं.

Chinook helicopter की खासियत:

•   इस हेलिकॉप्टर की ख़ासियत है कि यह छोटे हेलीपैड और घनी घाटियों में भी उतर सकता है.

•   यह हेलीकॉप्टर किसी भी तरह के मौसम का सामना कर सकता है.

•   इस हेलीकॉप्टर के ज़रिए भारतीय सेना अपनी टुकड़ियों को दुर्गम और ऊंचे इलाकों में जल्दी पहुंचा सकेगी, सेना को हथियार आसानी से मुहैया करवाए जा सकेंगे.

•   यह हेलीकॉप्टर बहुत तेजी से उड़ान भरने में सक्षम है, यही वजह है कि यह बेहद घनी पहाड़ियों में भी सफ़लतापूर्वक काम कर सकता है.

•   चिनूक हेलीकॉप्टर लगभग 11 टन तक का भार उठा सकता है.

•   चिनूक बहुउद्देश्यीय हेलीकॉप्टर है जिनका उपयोग दुर्गम और ज्यादा ऊंचाई वाले स्थानों पर जवानों, हथियारों, मशीनों तथा अन्य प्रकार की रक्षा सामग्री को ले जाने में किया जाएगा.

•   यह हेलिकॉप्टर घने कोहरे और धुंध में भी एक्शन लेने में सक्षम है. यह बेहद कुशलता से मुश्किल से मुश्किल जमीन पर भी ऑपरेट कर सकता है. इसे किसी भी मौसम में हर दिन-हर मिनट ऑपरेट किया जा सकता है.

चिनूक हेलीकॉप्टर इन देशों के पास:

पहली बार फरवरी 2007 में नीदरलैंड इस हेलीकॉप्टर का पहला विदेशी खरीददार बना था. उसने chinook helicopter के 17 हेलीकॉप्टर खरीदे थे. इसके बाद कनाडा ने साल 2009 में chinook helicopter के 15 अपग्रेड वर्जन हेलीकॉप्टर खरीदे थे. ब्रिटेन ने दिसंबर 2009 में 24 हेलीकॉप्टर खरीदे थे. ऑस्ट्रेलिया ने साल 2010 में पहले सात और फिर तीन CH-47D हेलीकॉप्टर खरीदे थे. सिंगापुर ने साल 2016 में 15 हेलीकॉप्टर का ऑर्डर कंपनी को दिया था. इस हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल 19 देशों की सेनाएं करती हैं.

चंद्रयान-2

चंद्रयान-दो (Chandrayaan-2) नासा के लेजर उपकरणों को अपने साथ चंद्रमा तक लेकर जाएगा. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के अधिकारियों के मुताबिक इससे वैज्ञानिकों को चंद्रमा तक की दूरी का सटीक माप लेने में मदद मिलेगी.

चंद्रयान-2 से पहले इजरायल के बेरशीट लैंडर के साथ भी नासा का लेजर रेट्रोरिफलेक्टर भेजा गया है. बेरशीट 11 अप्रैल को चांद पर उतर सकता है.

चंद्रयान-2 के बारे में:

•   चंद्रयान-2 भारत का चंद्रयान-1 के बाद दूसरा चंद्र अन्वेषण अभियान है जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने विकसित किया है.

•   अभियान को जीएसएलवी मार्क 3 प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपण करने की योजना है.

•   इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चन्द्र यान) तथा एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे.

•   इस अभियान को श्रीहरिकोटा द्वीप के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान द्वारा भेजे जाने की योजना है. उड़ान के समय इसका वजन लगभग 3,250 किलो होगा.

•   इसरो के अनुसार यह अभियान विभिन्न नयी प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल तथा परीक्षण के साथ-साथ नए प्रयोग भी करेगा.

•   चंद्रयान-2 मिशन में भारत निर्मित एक रोवर व लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरेंगे.

•   यह रोवर चंद्रमा की सतह से मिट्टी व चट्टान के नमूनों को विश्लेषण के लिए एकत्र कर चंद्रयान-2 ऑर्बिटर की मदद से धरती पर भेजा जाएगा.

लेजर रेट्रोरिफलेक्टर:

रेट्रोरिफ्लेक्टर ऐसे परिष्कृत शीशे होते हैं जो धरती से भेजे गए लेजर रोशनी संकेतों को प्रतिबिंबित करते हैं. ये सिग्नल यान की मौजूदगी का सटीक तरीके से पता लगाने में मदद कर सकते हैं जिसका प्रयोग वैज्ञानिक धरती से चंद्रमा की दूरी का सटीक आकलन करने के लिए कर सकते हैं.

चंद्रयान-1

भारत ने 22 अक्टूबर 2008 को अपना पहला चंद्र अभियान लांच किया था. चंद्रयान-1 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के अंतर्गत द्वारा चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला अंतरिक्ष यान था.

यह यान ध्रुवीय उपग्रह प्रमोचन यान के एक संशोधित संस्करण वाले राकेट की सहायता से सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया था. इसे चन्द्रमा तक पहुँचने में 5 दिन लगे पर चन्द्रमा की कक्षा में स्थापित करने में 15 दिनों का समय लग गया.

चंद्रयान का उद्देश्य चंद्रमा की सतह के विस्तृत नक्शे और पानी के अंश और हिलियम की तलाश करना था. चंद्रयान-प्रथम ने चंद्रमा से 100 किमी ऊपर 525 किग्रा का एक उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थापित किया. यह उपग्रह अपने रिमोट सेंसिंग (दूर संवेदी) उपकरणों के जरिये चंद्रमा की ऊपरी सतह के चित्र भेजे. चंद्रयान के साथ भारत चाँद को यान भेजने वाला छठा देश बन गया था.

भारत चंद्रयान-2 मिशन के सफल होने पर रूस, अमेरिका, चीन और इजरायल के बाद चांद पर अपना यान उतारने वाला पांचवां देश बन जाएगा.

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इन्हें अवश्य  देखें:

 

  1. Lucent General Science Book In Hindi {भौतिक और जीव विज्ञान}

  2. Lucent Chemistry Objective Questions And Answers (रसायन विज्ञान वस्तुनिष्ठ प्रश्न उत्तर)

  3. Ghatna Chakra GK Book In Hindi

  4. Kiran One Liner Approach General Knowledge

  5. Kiran General Awareness Chapterwise In English and Hindi

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