असहयोग आंदोलन Non-Cooperation Movement in Hindi

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Non-Cooperation Movement in Hindi [ असहयोग आंदोलन कब हुआ, इसके क्या कारण थे, इसके तुरंत और दूरगामी परिणाम, आंदोलन से गाँधी जी के जीवन पर प्रभाव ]

अग्रेज सरकार की बढ़ती ज्यादतियों का विरोध करने के लिए महात्मा गांधी ने एक अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन शुरुआत की। ये आंदोलन अपने आप में अनूठा था। जिसमें जनता भी बड़े आराम से भाग ले सकती थी और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध अपने गुस्से का प्रदर्शन कर सकती थी।

असहयोग आंदोलन का अपने आप में बहुत महत्व है क्योंकि ये आंदोलन अपने आप में पहला जन आंदोलन था जिसे जनता का इतने बड़े पैमाने पर समर्थन और सहयोग हासिल हुआ। इस असहयोग आंदोलन में शहरी माध्यम वर्ग और ग्रामीण क्षेत्र मे किसानो और आदीवासियो का इसे व्यापक समर्थन मिला।

लोगों को ये अपने आप में अलग तरीके का आंदोलन था जिसमें वो भी बड़े आराम से हिस्सा ले सकते थे और ले भी रहे थे। इस आंदोलन के अनुसार लोगों को अंग्रेजी शासन से सम्बंधित सभी प्रकार की सेवाओं को पूरी तरह से त्याग देना था जैसे अंग्रेजी सरकार द्वारा दी गयी नौकरी में जाना और उनके स्कूलों में पढाई नहीं करना आदि।

वकीलों ने अदालत में और डॉक्टरों ने अस्पताल जाने से मना कर दिया. कई कस्बों और नगरों में मजदूर हड़ताल पर चले गए. शहरों से लेकर गांव देहात में इस आंदोलन का असर दिखाई देने लगा और सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद असहयोग आंदोलन से पहली बार इतने कम समय में ही अंग्रेजी सरकार को परेशान करके रख दिया।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुई जिनमें 6 – 7 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख का नुकसान हुआ था। ग्रामीण क्षेत्र भी असन्तोष से आंदोलित हो रहा था। पहाड़ी जनजातियों ने वन्य कानूनों की अवहेलना कर दी। 

असहयोग आंदोलन का मुख्य कारण Main reason for non-cooperation movement

अंग्रेजी सरकार ने 1914-1918 के प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के किसी को भी कारावास की अनुमति दे दी थी। अब सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति की संस्तुतियों के आधार पर इन कठोर उपायों को प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी जारी रखा गया। इसके जवाब में गाँधी जी ने देशभर में इस अधिनियम (‘रॉलेट एक्ट’) के खिलाफ़ एक अभियान चलाया। जिसमें अंग्रेजी सरकार की नौकरी और सेवाओं से पूर्ण असहयोग था। इसलिए इसे असहयोग आंदोलन ( non-cooperation movement ) भी कहा गया। यही असहयोग आंदोलन का मुख्य कारण बन गया।

असहयोग आंदोलन क्या है what is non-cooperation movement

असहयोग आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया जाने वाला पहला जनांदोलन बन गया जिसका इसने बड़े पैमाने पर जन समर्थन प्राप्त हुआ। अंग्रेजी सरकार ने 1914-1918 के प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के किसी को भी कारावास देने जैसे कानून के और अंग्रेजी सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध में शुरू किये गए इस असहयोग आंदोलन की रूप रेखा इस सावधानी और सूझबूझ से महात्मा गाँधी ने तैयार की थी।

जिसमें बिना किसी हिंसा के आम जन भी अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध झंडा बुलंद कर सकता था। इसमें करना भी सिर्फ इतना था कि अंग्रजी सरकार की सभी नीतियों और सेवाओं को सहयोग नहीं देना या असहयोग करना था। जैसे अगर आप सरकारी कर्मचारी हैं तो ऑफिस नहीं जाना, किसी सरकारी स्कूल या कॉलेज में जाते हों तो स्कूल या कॉलेज का पूर्ण बहिष्कार।

महात्मा गाँधी के विचार से अगर हम पूर्ण रूप से असहयोग करने में सफल रहे तो एक वर्ष के भीतर ही हमें पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हो जायगी और साथ ही हमें यह भी मालूम चल जायेगा कि हम स्वशासन के लिए किस हद तक तैयार हैं।

इतने अच्छे से चलने वाले असहयोग आंदोलन में 4 फरवरी 1922 को ब्रिटिश भारत में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा में हुई थी, जब असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह पुलिस के साथ भिड़ गया था। जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने हमला किया और एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी, जिससे इस अग्निकांड में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल मरे।

यह घटना चौरी चौरा कांड के नाम से भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में प्रसिद्ध हो गयी। हिंसा की इस कार्यवाही से गाँधी जी ने इस असहयोग आंदोलन तत्काल वापस लेने का निर्णय लिया।

असहयोग आंदोलन के कारण बताये Give reasons for non-cooperation movement

1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया असहयोग आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देश भर में आयोजित पहला जन आंदोलन था। इस लेख में हम असहयोग आंदोलन के कारणों, विधियों, प्रभाव और अंत के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

असहयोग आंदोलन के चार मुख्य कारण थे:

  1. जलियांवाला बाग हत्याकांड और परिणामी पंजाब अशांति
  2. मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से असंतोष
  3. रॉलेट एक्ट
  4. खिलाफत आंदोलन

असहयोग आंदोलन क्या है समझाइए Explain what is non-cooperation movement

असहयोग आंदोलन में महात्मा गांधी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड, पंजाब अशांति, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड से असंतोष, रॉलेट एक्ट और खिलाफत आंदोलन के बाद लोगों में फैले असंतोष को ध्यान में रखते हुए ऐसे आंदोलन की नींव रखी जिसमें आम जनता भी भाग ले सके। जिससे अंग्रेजी शासन को भी यह पता चले कि आम जान को भी इस आंदोलन का समर्थन प्राप्त है।

इसके लिए गाँधी जी ने आंदोलन की रूप रेखा तैयार की जिसमें कहा गया था कि आम जन आंदोलन में भाग लेने के लिए हिंसा का सहारा लिए बिना अंग्रेजी सरकार के साथ करने वाले हर काम में सहयोग देना बंद कर दें या काम करना बंद कर दें। जैसे सरकारी ऑफिस में जाने वाले लोग ऑफिस जाना बंद कर दें , विद्यार्थी और शिक्षक सरकारी स्कूल जाना बंद कर दें , वकील न्यायालयों में जाना बंद कर दें। मजदूर वर्ग भी अंग्रेजी सरकार के लोगों को किसी प्रकार की सेवा देना बंद कर दें।

बिना किसी प्रकार का जोखिम उठाये या हिंसा का सहारा लिए बिना ही इस असहयोग आंदोलन को जनता का गजब का समर्थन हासिल हुआ और लोगों को भी आम जनता की ताकत का अंदाजा होने लगा।

असहयोग आंदोलन के कारण और परिणाम Causes and consequences of non-cooperation movement

असहयोग आंदोलन में महात्मा गांधी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड, पंजाब अशांति, मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड से असंतोष, रॉलेट एक्ट और खिलाफत आंदोलन के बाद अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करने और उनसे पूर्ण स्वराज मांगने के उद्देश्य से यह असहयोग आंदोलन शुरू किया गया था।

इस आंदोलन के चलते लोगों को ही नहीं बल्कि बड़े बड़े नेताओं को भी जनता की ताकत का अहसास होने लगा और अंग्रेजों को भी अब समझ में आने लगा था कि उनके प्रति नफरत अब आम जनता में भी फैलने लगी है जिसके चलते अब उनका भारत में ज्यादा समय तक राज करना संभव नहीं है।

साथ ही 12 फरवरी , 1922 चौरी चौरा काण्ड में हुई हिंसा के बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन की समाप्ति की घोषणा कर दी। उनके इस फैसले की खुले पैमाने पर निंदा होने लगी क्योंकि लोगों को लग रहा था कि जब सारा समाज अब अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ तब आंदोलन बीच में बंद करने का कोई अर्थ नहीं है।

असहयोग आंदोलन का दूरगामी प्रभाव यह रहा कि भले ही स्वराज के अपने प्राथमिक लक्ष्य को प्राप्त करने में असहयोग आंदोलन की विफल रहा इसके बावजूद, यह कई अन्य मामलों में सफल रहा है जैसे

  1. राष्ट्रीय कांग्रेस ने दिखाया है कि वह देश के बहुमत की राय का प्रतिनिधित्व करती है। इसे अब ‘सूक्ष्म अल्पसंख्यक’ का प्रतिनिधित्व करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है।
  2. आंदोलन का भौगोलिक प्रसार भी राष्ट्रव्यापी था। जबकि कुछ क्षेत्र दूसरों की तुलना में अधिक सक्रिय थे, कुछ क्षेत्र, यदि कोई हो, असहयोग के आह्वान के प्रति पूरी तरह से निष्क्रिय रहे।
  3. असहयोग आंदोलन जनता के लिए राजनीति में भाग लेने और वर्षों के विदेशी शासन के कारण होने वाले अन्याय और आर्थिक कठिनाई का मुकाबला करने का पहला अवसर था।

असहयोग आंदोलन कब हुआ When did the non-cooperation movement happen

असहयोग आंदोलन का प्रारम्भ 1 अगस्त 1920 में हुआ था और 12 फरवरी 1922 को चौरी चौरा नामक स्थान पर हिंसा के घटना होने पर गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन के समाप्ति की घोषणा कर दी थी।

असहयोग आंदोलन के उद्देश्य Objectives of non-cooperation movement

असहयोग आंदोलन का उद्देश्य मुख्य रूप से अंग्रेजों की नीतियों का मुखर रूप से विरोध करना और उनकी दमनकारी हथकंडों को सहते हुए उनके काम में पूरी तरह असहयोग करना। साथ ही जनता को अंग्रेजों की भारतीयों के प्रति खराब और दमनकारी नीतियों के प्रति जागरूक करना तथा संपूर्ण स्वराज्य के लिए लोगों को तैयार करना।

कांग्रेस का लक्ष्य संवैधानिक और कानूनी साधनों के माध्यम से स्व-शासन प्राप्त करने से शांतिपूर्ण और वैध माध्यमों से स्वराज प्राप्त करने के लिए स्थानांतरित कर दिया गया है। सदस्यता शुल्क को घटाकर 4 रुपए प्रति वर्ष कर दिया गया ताकि गरीबों का इसमें शामिल होना संभव हो सके कांग्रेस को यथासंभव हिंदी का प्रयोग करना था जिसे ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी बात को समझ सकें।

असहयोग आंदोलन के बारे में बताइए Tell us about the non-cooperation movement

असहयोग आंदोलन का आरम्भ Start of non-cooperation movement

अंग्रेजी सरकार के प्रेस पर प्रतिबंध और बिना जाँच के किसी को भी कारावास की अनुमति दे दी थी। अब सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति ने इन कठोर उपायों को प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भी जारी रखा गया और 13 अप्रैल 1919 में जलियाँवाला बाग कांड के बाद जनता में भी बहुत असंतोष था।

इसके लिए गाँधी जी ने 1 अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन की शुरआत की।

असहयोग आंदोलन प्रचार प्रसार और घटनाक्रम Non-cooperation Movement Publicity and Events

इसमें अली भाइयों के साथ, महात्मा गांधी ने कई छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता रैलियों और बैठकों का देशव्यापी दौरा किया और लोगों को खासकर विद्यार्थियों जागरूक करने का प्रयास किया।

इसके कारण हजारों छात्र स्कूल और कॉलेज छोड़कर पूरे देश में 800 से अधिक राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों में शामिल हो गए।

बंगाल में शैक्षिक बहिष्कार विशेष रूप से सफल रहा। सी.आर दास ने आंदोलन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुभाष बोस कलकत्ता राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख बने।

पंजाब में शैक्षिक बहिष्कार भी बहुत सफल रहा और लाला लाजपत राय ने यहाँ प्रमुख भूमिका निभाई।

देश के प्रसिद्ध वकील जैसे सी.आर. दास, मोतीलाल नेहरू, एम.आर. जयकर, सैफुद्दीन किचलू और अन्य जैसे वकीलों ने कानून अदालतों का बहिष्कार किया।

हालाँकि, असहयोग आंदोलन की सबसे सफल वस्तु विदेशी कपड़े का बहिष्कार था। बहिष्कार का एक प्रमुख रूप विदेशी कपड़े बेचने वाली दुकानों का धरना भी था। शराब की दुकानों पर भी धरना दिया गया। इससे स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण और प्रयोग में तेजी आई।

गांधी और कांग्रेस ने घरेलू वस्त्रों के समर्थन में हाथ से बनी खादी पर बहुत जोर दिया। चरखे व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए और खादी राष्ट्रीय आंदोलन की वर्दी बन गई।

जुलाई 1921 में, कराची में अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन में, मोहम्मद अली ने घोषणा की कि ब्रिटिश सेना में बने रहना ‘मुसलमानों के लिए धार्मिक रूप से गैरकानूनी है।


गांधी ने मोहम्मद अली के उपदेश को दोहराया, और कहा कि प्रत्येक नागरिक और सेना के सदस्य को दमनकारी ब्रिटिश सरकार से संबंध तोड़ लेना चाहिए।

बंगाल के मिदनापुर जिले में यूनियन बोर्ड करों के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया गया है। आंध्र जिले के गुंटूर में चिराला-पिराला और पेदानंदीपाडु तालुका में भी कर-मुक्त आंदोलन आयोजित किए गए थे।

यूपी में, जहां एक शक्तिशाली किसान सभा आंदोलन चल रहा था, जवाहरलाल नेहरू ने असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया।

केरल के मालाबार क्षेत्र में असहयोग और खिलाफत प्रचार ने मुस्लिम किरायेदारों, जिन्हें मोपला कहा जाता है, को उनके किराएदारों के खिलाफ जगाने में मदद की, लेकिन आंदोलन ने कभी-कभी एक सामान्य रंग ले लिया।

असम में चाय बागान के मजदूर हड़ताल पर चले गए। जबकि आंध्र वन कानूनों की अवहेलना के कारण लोकप्रिय हो गया।

भ्रष्ट महंतों (पुजारियों) से गुरुद्वारों का नियंत्रण छीनने के लिए असहयोग आंदोलन के हिस्से के रूप में पंजाब में अकाली आंदोलन हुआ।

असहयोग आंदोलन का अंत End of non-cooperation movement

4 फरवरी 1922 को ब्रिटिश भारत में गोरखपुर जिले के चौरी चौरा नाम के स्थान पर असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले प्रदर्शनकारियों का एक बड़ा समूह पुलिस के साथ भिड़ गया था। जवाबी कार्रवाई में प्रदर्शनकारियों ने हमला किया और एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी, जिससे इस अग्निकांड में 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल मरे। इसके बाद ही महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन या कह कर वापस ले लिए था कि शांतिपूर्ण और अहिंसक असहयोग आंदोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है।

FAQ

Q – असहयोग आंदोलन कब प्रारंभ हुआ When did the non-cooperation movement start ?
Ans – 1 अगस्त 1920

Q – असहयोग आंदोलन का अंत कब हुआ था ?
Ans – 4 फरवरी 1922

Q – जलियांवाला बाग हत्याकांड कब हुआ था When did the Jallianwala Bagh massacre take place?
Ans – जालियाँवाला बाग हत्याकांड भारत के अमृतसर, पंजाब प्रान्त के में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) हुआ था।

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